Pyaar ke dariyaa se guzarte huye

(Also covered in my column, Kulture कढ़ी in NBT (Navbharat Times), a Hindi newspaper in India) on Mar 8th, 2015
प्यार के दरिया से गुजरते हुए…

मनीष गुप्ता

‘प्यार क्या है/’ सन् 2012 में यह गूगल पर सबसे ज्यादा ढूंढा गया सवाल था। ऐसा सवाल जिसका जवाब हर किसी के पास होना चाहिए, क्योंकि हर किसी को कभी न कभी इश्क हो ही जाता है- चाहे वो एक स्कूल जाने वाला बच्चा हो, आपका दूधवाला, फैमिली डॉक्टर, कनाडा वाली मौसी या दिग्विजय सिंह हों। सुनते हैं कि जब प्यार होता है तो एक बाढ़ आती है जिसमें सब कुछ डूब जाता है। Whatsapp या फेसबुक पर जो ज्ञान की/ फलसफों की आंधी चल रही होती है, उसके मुताबिक इश्क इबादत है, शहादत है, हिमाकत है, तिजारत है, खुशियों से भरा आकाश है, आग का दरिया है, उनकी आवाज की खनक है, खुदा से मिलने का जरिया है, सिर्फ अहसास है रूह से महसूस करने का, आंसुओं का खजाना है, बहाना है रो-रो के बाल्टी भरने का, इश्क सुबह की ओस पर पड़ती सूरज की पहली किरण है, इश्क आहों में डूबी रात के पिछले पहर सताने वाली माथे की शिकन है वगैरह। क्या कीजिए कि चौदह साल के बच्चों को ‘ब्रेकअप’ से जूझना आ जाता है। उधर, शादीशुदा साठ-साला को भी कहीं कोई भा जाता है। इश्क के कितने चेहरे, कितने ही नाम हैं, फिर भी दुनिया में लव-मैरेज और डाइवोर्स, दोनों ही एक मजाक की तरह आम हैं।

इश्क की इतनी परिभाषाओं, इतने आख्यानों के बावजूद अगर लोगों को इसका मतलब गूगल पर ढूंढने की जरूरत पड़ी तो एक बात तो साफ है कि प्यार के मायने समझने में कहीं न कहीं कोई उलझन तो है। शायद इसे समझना इतना आसान नहीं है जितना पहली बार किसी को ‘आई लव यू’ बोलने वाले शख्स को लगता है। पहले पहल प्रेमाभिव्यक्ति करने वाले को एक पूर्णता का आभास होता है, कि जिसे मैं प्रेम करती/ करता हूं, वही व्यक्ति मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन समय के साथ रंग उतरने लगते हैं, नई अपेक्षाएं उग आती हैं और धीरे-धीरे प्यार की प्राथमिक अनुभूतियों पर धूल जमना प्रारंभ हो जाता है। और संभवतः ऐसे ही अवसरों पर इंसान गूगल का सहारा लेता होगा- जब अपने प्यार की आरंभिक तरंगों के प्रति संशय और दुविधा की भावना आ जाती होगी।

अनेक आयामों, भ्रांतियों और (अ)व्यवस्थाओं वाले विषय पर लिखना आसान नहीं है- बल्कि एक बड़ा जोखिम हैं, फिर भी एक कोशिश है क्योंकि मैं मानता हूं कि प्यार शायद इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ऊर्जा-स्रोत है। और इस बात की पुष्टि हर एक दार्शनिक, वैज्ञानिक, हर सफल व्यक्ति ने, जिससे मैं मिला हूं, की है। इस विषय को उठाने का कारण मुख्यतः यह पुनःस्मरण कराना है कि आप सबके पास यह संभावना मौजूद है कि आप अपने सभी सपनों/ झकों/ फंतासियों को प्यार के सहारे पा सकते हैं, चाहे जो भी आपकी उम्र या अवस्था हो; चाहे जो भी आपकी सोच या व्यवस्था हो।

बुनियादी मंत्र यह है कि प्यार आपको पूर्ण करता है। अब पूर्णता की सबकी अपनी-अपनी परिभाषाएं हैं। कोई ‘चिट्टी कलाइयां’ देख कर आनंदित हो जाता है, किसी को ‘टॉल, डार्क, उदार पे-पैकेज’ में पूर्णता दिखती है। अधिकतर लोग प्यार में पड़ जाते हैं जब उन्हें लगता है कि कोई उन्हें समझता है, जिसके साथ वे अपने दर्द बांट सकते हैं। कोई बिना परेशानी के घर चलाने वाली/ बच्चे पालने वाली से खुश रहने के मंसूबे बांधता है, तो कोई ‘राहुल तुम कितने अच्छे हो, अव्वल आते हो, और फेसबुक पर हर किसी की फोटो ‘like’ भी नहीं करते’ सोच कर चिरकाल के लिए राहुल की हो जाने के सपने देखती है। और जिन्हें एक जैसे शौक और सपने करीब लाते हैं, वे अपने आपको दूसरों से बेहतर समझते हैं। और वे शायद बेहतर होते भी हों, क्योंकि उनकी बुनियाद में एक दूसरे के व्यक्तित्व से परे के आयाम भी हैं।

अगर आप ऊपर लिखे कारणों पर चिंतन करें तो शायद आपको लगेगा कि ‘अरे, ये कारण बिलकुल भी पर्याप्त नहीं हैं।’ इस आधार पर बने रिश्ते तो जल्द ही दम तोड़ देंगे। और अमूमन ऐसा होता भी है। इसीलिए इतने ब्रेकअप्स और तलाक होते हैं आजकल। अब समाज बदल गया है। आम तौर पर लोग ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं। जिंदगी और रिश्तों से ज्यादा अपेक्षाएं रखते हैं। ऐसे समय में इश्क ज्यादा पेचीदा पहेली है। इसे साधना मुश्किल है मगर आप किसी तरह से इसे साध लें तो जीना आसान भी हो सकता है।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता की पंक्तियां हैं: तुम्हारे साथ रहकर/ अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है/ कि दिशाएं पास आ गई हैं/ हर रास्ता छोटा हो गया है/ दुनिया सिमटकर एक आंगन-सी बन गई है आकाश छाती से टकराता है/ मैं जब चाहूं बादलों में मुंह छिपा सकता हूं। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे महसूस हुआ है कि हर बात का एक मतलब होता है, यहां तक कि घास के हिलने का भी/ हवा का खिड़की से आने का, और धूप का दीवार पर चढ़कर चले जाने का/ तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं संभावनाओं से घिरे हैं…

Link to this article on NBT : http://epaper.navbharattimes.com/paper/12-16@16-08@03@2015-1001.html 

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