Culture Kadhi – Hindi ke din phirne wale hain

(Also covered in my column, Kulture कढ़ी in NBT (Navbharat Times), a Hindi newspaper in India) on Feb 22nd, 2015

हिंदी के दिन फिरने वाले हैं

मनीष गुप्ता

रामायणा, महाभारता, योगा, कृष्णा, रावणा.. ये संज्ञा के अंत में ‘आ’ की मात्रा कहां से आई/ और आई तो सब जगह क्यों नहीं आई/ कानपुरा, नागपुरा, गाजरा, गिलासा, बोतला, नमका क्यों नहीं हुआ/ संजया, सचिना क्यों नहीं हुआ/ कंबला, कागजा क्यों नहीं हुआ/

क्या ‘बकवासा’ है/

कौन से महाशय ने पहले-पहल इस तरह हिंदी का अंग्रेजी में अनुवाद किया होगा/ अब तक तो खैर वो हमारे बीच नहीं होंगे मगर मुझे विश्वास है कि उनकी इस कारगुजारी के बाद उन्हें निर्वाण (अगर निर्वाण सचमुच संभव है) तो नहीं प्राप्त हुआ होगा। उनकी आत्मा हमेशा-हमेशा के लिए निलंबित होगी ही, तो किसी दिन टकराएगी भी- मैं पूछूंगा कि श्रीमन् आपने हिंदी भाषा के साथ कौन-सी दुश्मनी निकाली थी/ क्या आप जानते हैं कि हम भारतवासी इस बात का खामियाजा आज तक भर रहे हैं/ मुझे ये भी अंदेशा है कि वह महानात्मा अपने चेहरे पर असीम शांति ओढ़ कर पूछेगी कि क्यों पेट में दर्द हो रहा है भाई/ हॉर्मोनल इंबैलेंस है क्या/ और किसी को तो कुछ बुरा नहीं लगा, आप ही के पेट में क्यों दर्द हो रहा है/ इस देश में अभी तक तो हिंदी के लिए दर्द होने का फैशन नहीं आया है। न ही इसके हिंदी के खिलाफ जाने-अनजाने हो रहीं कुटिलताओं और बेवकूफियों के बारे में बात करने पर आप ‘कूल’ दिखते हैं।

वैसे यह बात सिर्फ हिंदी की नहीं है, लगभग हरेक क्षेत्रीय भाषा का यही वर्तमान प्रारब्ध है – अंग्रेजी के आगे सब ढेर हैं। आश्चर्य इस बात का है कि हर कोई बाजारीकरण की दुहाई दे रहा है जिसके चलते हिंदी भाषा पतनशील है, जबकि आज हमारे देश में हिंदी ही सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है – हिंदी फिल्में, हिंदी गाने, हिंदी अखबार और हिंदी टीवी चैनलों का बोलबाला है – आज सबसे बड़ा मार्केट हिंदी का है। बाजारी गणित कहता है कि जिसका मार्केट शेयर सबसे बड़ा है, वही बादशाह है – पर हमारी देसी कंपनियों की सूझबूझ सीमित है शायद जो इस बात को पूरी तरह नहीं भुना पा रही हैं। जैसे हमारे नमकीन के बाजार को सबसे बड़ी सफलता मिली जब पेप्सी ने ‘लहर’ के ब्रैंडनेम से हमारे यहां नमकीन बेचना शुरू किया। हमारा नमकीन, हमारा बाजार मगर उनके हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी। वैसे ही विदेशी टीवी चैनल्स ने हमें नए कलेवर में हिंदी शो परोसे हैं – कलर्स, स्टार, सोनी.. सभी विदेशी व्यापार हैं। हमारी अदूरदर्शिता की वजह से अमेरिकन कंपनियों ने आ कर टीवी चैनल्स पर कब्जा जमा रखा है – KFC ने बिरयानी बेचना शुरू कर दिया है। देखना है, कब McDonald’s पानी-पूरी और दही-भल्ले बेचना शुरू करता है और कब वालमार्ट हमें सबसे सस्ती सब्जियां और दूध मुहैया कराता है।

बाजार के खिलाड़ी भूखे भेड़िये होते हैं, हमेशा ग्राहक और उसकी आवश्यकताओं की टोह लेते हुए घूमते हैं। कितना वक्त लगेगा उन्हें हिंदी का एक व्यापक मार्केट और उसके अभाव ढूंढने में/ हिंदी का बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा रहा है बाजार में एक बहुत बड़ा शून्य है अच्छी हिंदी पत्रिकाओं का, उम्दा हिंदी साहित्य की मार्केटिंग का, नई एप्स, कंप्यूटर गेम्स, यहां तक कि बेहतर रिपोर्टिंग और सामाजिक सोच संवारने वाले अखबारों का… यहां अच्छा लिखने वाले तो हैं और पढ़ने वाले भी, बस ठीक से मार्केटिंग नहीं हो रही है।

हिंदी मार्केट की उपेक्षा बड़े व्यापारिक घरानों की बदतमीजी नहीं, मूर्खता है। उन्हें जागना तो है ही। अगर पहले नहीं जागेंगे, तो विदेशी कंपनियों के आगमन के बाद हाथ मलेंगे। हालांकि वो थोड़ी शर्म की बात होगी मगर किसी दिन न्यू यॉर्क टाइम्स ‘भारतवर्ष’ नाम की अतिआकर्षक और गहरी पैठ वाली पत्रिका हर घर, हर फोन पर पहुंचा दे, तो आश्चर्य नहीं होगा।

किसी भी दूरदर्शी व्यापारी के लिए, जो कि अमेरिकी मानसिकता में कूट-कूट कर भरी हुई है, हमारे देश में जगह बनाना टेढ़ा खेल नहीं होगा। जूते, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और अब खाना तो वो वैसे ही हमें बेच रहे हैं, कल हमारी संस्कृति और भाषा भी हमें बड़े मजे से बेचेंगे और हम सब उसे अपनाएंगे। उसके बाद तमाम देसी कंपनियां खड़ी हो जाएंगी हिंदी की तरक्की में बचा-खुचा मार्केट-शेयर लेने। और यह इस देश, इस संस्कृति और सभी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए अच्छी बात होगी। भरोसा रखें, वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं है – हमारी भाषा हमारी रग-रग में रची-बसी है, आज यह हमारी और बाजार की जरूरत है, इसे वापस आना ही है, इसे स्टाइलिश बना कर वापस हमें पेश करना कोई बेहद मुश्किल बात नहीं है। जिस उपभोक्तावाद ने इसे हाशिये पर पहुंचाया है वह बहुत शक्तिशाली है, और अब वही इसे वापस भी लाए, यही हमारी नीति होनी चाहिए। सरकार सिर्फ ये बार-बार दिखा दे कि हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएं एक बड़ा मार्केट हैं, इनका विकास तो पूंजीवादी ताकतें कर ही लेंगी।

बाजारी व्यवस्था ही हिंदी के काम आने वाली है- या तो हमारी स्वदेशी कंपनियां जाग जाएंगी और हिंदी का बाजारीकरण कर के हिंदी को वापस लाएंगी और अगर उन्होंने देर की, तो अमेरिकन इकाइयां हिंदी बाजार को बेहतर तौर से दुहने के लिए हिंदी भाषा और इसके साहित्य का प्रचार-प्रसार करेंगी। हिंदी के समर्थक आज इंग्लिश की आंधी के खिलाफ हताश हुए बैठे हैं। मुंबई यूनिवर्सिटी में गए दिनों हिंदी के वक्ताओं को कहते हुए सुना कि ‘पिज्जा-कोक-कल्चर’ को छोड़ने पर ही हिंदी का विकास हो सकता है – यह घटिया और हारने वाली सोच है, वो कल्चर कहीं नहीं जा रहा। हिंदी का विकास पुरातनपंथियों से चिपकने से नहीं होगा, ना हिंदी को थोपने से। मार्केट हिंदी या इंग्लिश में भेद नहीं करता है, जहां पैसे हैं, वहां संभावना ढूंढता है। इसीलिए मुझे पूरी उम्मीद है कि जो उपभोक्तावाद हमारी भाषाओं को किनारे लगा चुका है वही उन्हें जिलाएगा, अमृत-पान कराएगा।

जाने-माने विचारक, कवि विष्णु खरे ने हालिया लिखा था: ‘आप’ की दिल्ली विजय,और ‘आप’ से पहले संसद-स्तर पर भाजपा की विजय – दोनों चुनाव हिंदी के माध्यम से लड़े और जीते गए। अंग्रेजी लगभग पूर्णरूपेण अनुपस्थित थी। मैं समझता हूं कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों की वर्तमान दयनीय स्थिति का एक बड़ा कारण धीरे-धीरे उनका हिंदी-निरक्षर होते जाना है।

तो जनाब, सचाई यह है कि हिंदी तो बनी हुई है, बल्कि दिन-ब-दिन और महत्वपूर्ण होती जा रही है और आने वाले समय में इसके दो दुश्मन – बाजारीकरण और उपभोक्तावाद – इसके दोस्त बनाने वाले हैं, फिर देखिएगा किस तेजी से चीजें बदलती हैं। इस मामले में तो अच्छे दिन आने ही वाले हैं, क्योंकि इस विषय पर हम सरकार पर निर्भर नहीं कर रहे।

समीकरण बदल रहे हैं दोस्त!

Link to this article on NBT : http://epaper.navbharattimes.com/details/25463-38050-1.html
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