Culture Kadhi – Baba Valentine Ka Bhoot

(Also covered in my column, Kulture कढ़ी in NBT (Navbharat Times), a Hindi newspaper in India) on Feb 8th, 2015

बाबा वैलंटाइन का भूत

मनीष गुप्ता

यहां देखें विडियो:  https://youtu.be/ZoAHw7lNh9Y

शख्स ऐसा था कि उस पर नज़र जाए तो आप हटा न पाएं। एक शांत चेहरे वाला बुज़ुर्ग, ज्यादा ऊंचा कद नहीं पर बड़ी-बड़ी नानक आंखें, बढ़ी दाढ़ी, उलझे लंबे बाल और माथे पर असंगत गुलाबी हेड बैंड, अच्छी कड़ी का हरा कुर्ता, डिज़ाइनर झोला और मुंह पर ओशो जैसा स्मिताभास। चर्चगेट स्टेशन पर वे साहब ट्रेन से निकले और पैदल एक तरफ चल दिए। मुझे कौन सा काम था, मैं भी पीछे चल पड़ा। वे भटकते रहे गली-दर-गली। आर्ट गैलरीज़, संग्रहालयों में टहलते रहेे। चलते-चलते दोपहर होने को आई तो एक ईरानी कैफे में बैठ गए। अच्छा किया वर्ना मेरी टांगे तो जवाब देने लगी थीं। मैं उनके टेबल पर ही जा बैठा। मुस्कराहट का आदान-प्रदान हुआ, मैंने अपना परिचय दिया। उनके जवाब में कुछ न बोलने पर उनसे कुरेद की कि आप कौन हैं। उन्हें मजबूरन बात करनी ही पड़ी:

‘वैलंटाइन’- वे बोले, ‘मैं सैंट वैलंटाइन हूं।’

‘हां वही’- उन्होंने मेरे चेहरे पर छाए गाढ़े अविश्वास को देखते हुए कहा।

‘मगर वे तो कब के…’

‘मैं उनका भूत हूं।’

मेरी थकान भाग गई – मस्तिष्क सजग हो गया – मैं अपने आप ही पीठ सीधी कर बैठ गया। इतनी बड़ी शख्सियत, जो पूरी दुनिया में फरवरी के महीने में उथल-पुथल मचा देती है, मेरे रूबरू चाय पी रही थी।

बात सिर्फ एक दिन की नहीं है – इस दिन का बुखार हफ्तों पहले से चढ़ता है और खुमारी महीनों तक नहीं उतरती। कई जगह मुहल्ले के छुटभैये नेता जोड़ों को हड़का के बड़े हो जाते हैं। चुनाव पास हों तो राजनीतिक पार्टियों के लिए पशोपेश वाला मुद्दा हो जाता है की इस बार कितनी आंखे फेरें या कितना विरोध करें। ऑनलाइन रीटेल वाली कंपनियां पागल हुई जा रही हैं। प्रस्तुत है इन सबके पीछे जो शख्स हैं (उनके भूत) से बातचीत के अंश:

प्रश्न: आप पश्चिमी दुनिया के इतने बड़े संत हैं – अपने जन्मदिन के मौके पर यहां, भारत में, क्या कर रहे हैं/

उत्तर: (मुस्कुराने, दाढ़ी खुजलाने, देर तक आकाश ताकने के बाद) आजकल भारत ही मेरा घर है। अगर रोम (जहां के वे थे) में यहां से आधा भाव भी मिलता तो शायद वहीं रहता, मगर भारत में आज जो मेरी पूछ-परख है, कही नहीं है।

प्रश्न: क्या बात करते हैं आप/ बड़े शहरों को छोड़ें तो भारत में ऐसे कितने लोग होंगे जो आपको नहीं जानते हों – पश्चिम में तो हर इंसान आपको जानता है। इस दिन को मानता है।

उत्तर: मानता होगा, मगर सिर्फ एक ही दिन! यहां तो हमारे लिए पूरा हफ्ता अलॉट कर दिया गया है। चॉकलेट डे, टेडी डे, रोज़ डे… और किसी देश में ऐसा नहीं होता। तुम तो रहे हो अमेरिका में, तुम्हें तो मालूम ही होगा। आज हमारे दिन को लेकर मार्केटिंग गिमिक्स को जो अभूतपूर्व उत्साहवर्धक सफलता आपके देश में मिली है, और इससे बड़े-बड़े संतों को जो जलन हुई है कि बता नहीं सकता।

आप मृत्युलोक वासी हैं तो शायद ही समझ पाएं – मरणोपरांत भी रसूख की लड़ाई चलती रहती है संतो के बीच। जिस किसी संत के जन्म या मरण दिवस पर एक दिन की छुट्टी भी होती है तो इतराते हुए घूमते हैं। जब से यहां मुझे सात दिन मिले हैं कोई नहीं ठहरता है अपने सामने। यह तो एक बात है, आपके यहां तो और भी गजब… (उन्होंने अपने आप को रोक लिया)

मैं: क्या गजब हो रहा है यहां/

संत V: यह त्योहार प्रेमियों का है, पति पत्नी का है। जैसे राखी भाई-बहन का है। मगर आजकल इंडिया में लोग मां-बाप, भाई-बहन, फ्रेंड्स, पड़ोसी… जो मिल गया सबको विश करने लगे हैं। खैर, हमारा क्या जाता है (गद गद होकर)। अपना तो मार्केट दिन-दूना, रात चौगुना बढ़ता जा रहा है।

मैं: लोग आपको इतना चाहते हैं और आप उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं/

संत V: भई इस वर्ष आपको देश में, इस मौके पर करीब 18000 रुपये के तोहफे-तोहफियां बाटें जाएंगे – क्या आपको अंदाज़ा है कि आपके देश की अर्थव्यवस्था का कितना भला हो रहा है – वह भी फरवरी जैसे महीने में/

बात उनकी सही थी, मैं निरुत्तर हो गया। थोड़ी चुप्पी के बाद वे आगे बोले-

संत V: न सिर्फ ईसाई बल्कि हिन्दू, मुस्लिम सभी समुदाय हमारे पर्व को धूम-धाम से मनाते हैं। आज मैं धर्म और देशों की सीमाएं तोड़कर काफी आगे निकल आया हूं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि आप भारतीयों को इसका श्रेय जाता है। ऐसे ही आप पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण करते रहें तो मेरी आत्मा बहुत खुश होगी।

एक क्षण को मेरी नज़र उनसे हटी तो वे अंतरध्यान हो गए।

Link to this article on NBT: http://epaper.navbharattimes.com/paper/12-16@16-08@02@2015-1001.html

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