Culture Kadhi – Traffic mein fanse sawaal

(Also covered in my column, Kulture कढ़ी in NBT (Navbharat Times), a Hindi newspaper in India) on Jan 25th, 2015

ट्रैफिक में फंसे सवाल

मनीष गुप्ता

‘जब मैं पुणे में था, तो मुंबई वाले मामा के घर खूब आना-जाना था। वे चेंबूर में रहते हैं- घर से निकला फटाक से पहुंचा, फटाक से वापस।’ ऐसा कहने वाले भांजे साहब जबसे मुंबई के वेस्टर्न सबर्ब के रहवासी हो गए हैं, ट्रैफिक की वजह से मामाजी से मिलना-जुलना लगभग बंद है।

प्रख्यात लेखक-पत्रकार विष्णु नागर अपने अद्भुत संकलन ‘ईश्वर की कहानियां’ में अगर मुंबई के बारे में भी लिखते, तो एक लघुकथा शायद इस तरह होती: ‘एक बार ईश्वर ने सोचा कि चलो मुंबई जाकर वहां के प्रत्येक प्राणी की पीड़ा को हरा जाए। ईश्वर पूरी तैयारी से, उफनते हुए self-motivation के साथ मुंबई पहुंचे और जी-जान से अपने काम में लग गए, मगर कुछ हफ्तों में ही, ट्रैफिक से परास्त, बोझिल, थके हुए कदमों से लौट गए।’

बहरहाल, मुझे मुंबई की ट्रैफिक (अ)व्यवस्था को लेकर एक बातचीत हमेशा याद आती है। एक फ्रेंच लेखक जो मुंबई में तकरीबन सवा महीने से रह रहे थे, प्रशासन की अदूरदर्शिता पर बेहद भड़के हुए थे। हम मोंडेगार (कोलाबा) में बैठे थे और वो साहब 2-3 बीयर गुड़क चुके थे। बात मेरे विलंब से पहुंचने के कारणों की हो रही थी जो अवश्यत: ट्रैफिक संबंधी ही थे। ‘क्या मुश्किल है/’ उन्होंने फरमाया, ‘लोग फालतू में ही रोड्स के लिए जगह न होने का रोना रोते हैं। आपके शहर की इस समस्या को बड़े आराम से हल किया जा सकता है। देखो, जो लोकल की रेलवे लाइंस हैं, उन्हीं के ऊपर (अगर नीचे नहीं हो सकता है) एक दूसरी रेलवे लाइन बना दो, हो गई ना क्षमता डबल/ उसके बाद और चाहिए तो उसके ऊपर एक हाईवे भी बनाया जा सकता है।’ उस जमाने में उन्होंने ईस्ट और वेस्ट को जोड़ने के लिए रिलायंस मेट्रो जैसी तीन-चार लाइंस जो आपस में भी जुड़ी हो, बनाने की बात भी की थी। तब तो ये बातें सुरूर में हांकी गई लफ्फाजी लगी थी, पर अभी भी कई बार सोचता हूं, क्या ऐसा संभव है/

बीएमसी के पास भरपूर बजट है- हमेशा रहा है, फिर भी इस शहर में ईस्ट और वेस्ट के बीच की भयावह दूरियां बनी रही हैं और इसमें बेचारे टाउन प्लानर्स को क्या दोष दें/ जो भी अच्छा-बुरा उनकी अकल ने करवाया, उन्होंने किया होगा। चाचू के फोन करने पर उनकी नौकरी लगी होगी। क्लास टॉपर्स तो वैसे भी उसी इंजिनियरिंग कॉलेज में पढ़ा रहे होंगे जहां उन्हें सर्वोच्च स्थान मिला होगा। वैसे मेधावी छात्र शिक्षक बनें, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है/ मगर ऐसे आने वाली पीढ़ियों के उद्धारकर्ता जिनकी विद्वत्ता समय के साथ बहुत तेजी से घिस कर अत्यधिक बौनी हो जाती है, फिर उनकी साफ-सुथरी जिंदगी (ऐसा वे ही कहते हैं) यूजीसी अनुदान के सपने देखते हुए, शिक्षक दिवस पर नेक टाई या गुलाब का फूल खोंस कर खीसें निपोरते हुए गुजरती है।

यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

हार्वड यूनिवर्सिटी, ऑक्सफोर्ड, एमआईटी तथा अन्य आइवी-लीग के महाविद्यालयों में आने वाले समय के सामाजिक-आर्थिक-वैज्ञानिक परिवर्तनों के बीज उगते-पनपते हैं। और हमारे यहां के नामी शिक्षण संस्थान क्या बनाते हैं/ नन्हीं-नन्हीं, छोटी-छोटी पैसा कमाने की मशीनें जो उस विद्यालय की कोख से निकलने के पहले ही एक अश्लील-से दिखने वाले वेतन पर मल्टीनैशनल्स की प्रचंड मशीनरी में विलीन हो जाते हैं- अपनी ताजा-ताजा उगी हुई मूंछों पर ताव देते हुए और अपने मित्रों और रिश्तेदारों को ‘पॉजटिव थिंकिंग’ का पाठ पढ़ाते हुए।

शिक्षा पद्धति जैसी विषयवस्तु पर एक भिन्न दृष्टिकोण भी दे दूं, क्योंकि श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में प्रकाशित अपने कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ में लिखा था कि ‘वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।’ उन्होंने यह आज से 47 साल पहले लिखा था। अब इस बात के आप दो मतलब निकाल सकते हैं कि या तो इस लेख में मौलिकता का अभाव है अथवा हमारी शिक्षा-प्रणाली उतनी नहीं बदली, जितनी आवश्यकता थी। यह आज भी नौकरी और नौकरशाही उत्पन्न करने का उपकरण है- इंसान को इंसान बनाने का नहीं।

* * *

उधर, सिटी-प्लानर के साले साहब जर्मनी घूम कर आते हैं और जीजाजी को रेड-वाइन की चुस्कियों के बीच शहर सुधारने की सुसलाहें देते हैं (और जनता आने वाले कई दशकों तक सर धुनती है)।

* * *

मोदी जी/स्मृति जी: महाविद्यालय महज डिग्री छापने के कारखाने न रहें, बल्कि आने वाले कल के संपूर्ण विकासार्थ रिसर्च व प्रयोगों की खदानें भी बनें।

Link to this article on NBT : http://epaper.navbharattimes.com/paper/10-16@16-25@01@2015-1001.html

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