Culture Kadhi – Cool hai cycle

(Also covered in my column, Kulture कढ़ी in NBT (Navbharat Times), a Hindi newspaper in India) on Dec 14th, 2014

कूल है साइकल…
मनीष गुप्ता

‘Sorry मैं बहुत लेट हो गयी। इतना ट्रैफिक! भगवान… जितना दिल्ली में काम पर जाने वाले व्यस्त घंटों में होता है, उतना मुम्बई में हमेशा रहता है…’

मुम्बई… सपनों का शहर… यहां सब कुछ मिलता है शोहरत, पैसा, वोदका-पूरी, पैदल चलकर जाओ तो गणपति बप्पा; और थोड़ा जोर लगाओ तो शायद मां भी। बस, नहीं मिलता है तो लोकल में घुसने का मौका और खाली रोड।

न्यू यॉर्क में, अगर आप कार से निकले हो तो, सुबह और शाम का पीक आवर्स का ट्रैफिक रुला देता है। पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन हालांकि ठसाठस भरा होता है फिर भी मुंबई के मुकाबले बेहतर है। लॉस-ऐंजेलस और लंदन का भी ट्रैफिक से बुरा हाल है।

ज्यादातर देशों के बड़े शहरों में अपनी कार से ऑफिस जाने के बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है। मेक्सिको सिटी में तो चुनिंदा दिनों में सम अथवा विषम नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को डाउन टाउन में प्रवेश ही नहीं दिया जाता। यही तरीका तमाम यूरोपीय शहरों में भी अपनाया गया है मगर वहां का पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन कमाल का है।

एक और चीज कमाल की रही है यूरोप में – वो है साइकिलों का उपयोग। उनके लिए बाकायदा एक अलग लेन होती है। जगह-जगह साइकल स्टैंड भी हैं – आप कार्ड स्वाइप कीजिए, साइकल निकालें, जहां भी जाना है, उसके आसपास कोई साइकल स्टैंड होगा ही, वहां आप साइकल छोड़ सकते हैं। शहरों में साइकल कारों से अमूमन तेज ही चलती है, वातावरण को कम खराब करती हैं, पार्क करना आसान है और स्वस्थ्य जीवन-शैली तो है ही। साइकल पर घूमा हुआ मुंबई मुझे बहुत खूबसूरत लगता है। अगर एक-दो किलोमीटर ही जमा है, तो मैं पूरी तरह साइकल प्रेमी हूं और अक्सर कार और ऑटो रिक्शा से कम समय में पहुंच जाता हूं- कार निकालने, पार्क करने में कितना वक्त जाया होता है, उतना ही ऑटो रिक्शा ढूंढने में लगता है।

कई दफा लोकल ट्रेन में साइकिल रखकर हम लोग टाउन तरफ भी गए हैं और मुंबई शहर के अनगिन लुके-छुपे खजानों का बड़ा लुत्फ उठाया है। साइकल पर आपके एक तरह से पंख लगे होते हैं, ऐसा निजी कार और टैक्सी क्या, अन्य दुपहिये वाहनों के साथ भी संभव नहीं है। बस, एक अफसोस है कि सलीकेदार पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं मिलती है। बीएमसी एक खुली आंखों वाला महकमा है, तो एक दिन वो भी हो जाएगा।

संपूर्ण देश में मुंबई ही शायद ऐसा शहर है जहां लोग आपको आपके पहरावे या अन्य दिखावटी चीजों से नहीं आंकते, वरना दिल्ली जैसी जगह पर एक साइकल पर घूमते हुए टीवी प्रड्यूसर का तो बड़ा मखौल ही बन जाए, वहां तो लगभग हर इंसान अनिवार्यत: अपने हाथों में महंगे से मंहगा फोन ओर अपनी कार की चाबी हमेशा रखता है- और आपको भी ऐसे ही तौलता है। मैंने मुंबई में कभी निजी कार की जरूरत ही नहीं समझी- एक खुद पेंट की हुई साइकल है, एक मॉडिफाइड सेकेंड हैंड बाइक है- फिर टैक्सी, ऑटो रिक्शा तो हैं ही। वैसे कभी-कभार लोगों ने ये जरूर कहा कि ‘hmm साइकल से घूमते ही, ज्यादा cool बनने की कोशिश कर रहे हो!’

एम्स्टरडम, म्यूनिख, लंदन, लक्सेमबर्ग, ब्रसेल्स आदि जगहों पर साइकिल से ही घूमा हूं- वहां लोग भी कहते हैं कि यही हमारे शहर को छानने का सबसे अच्छा जरिया है। इन जगहों पर कई भारतीय पर्यटक भी देखे हैं। मियां-बीवी बड़े मजे से सीटियां बजाते हुए स्मारकों पर साइकल पार्क करते हुए दिख जाते हैं। मगर ये ही लोग कभी अपने देश में साइकल की नहीं सोचते। जब मैं लोगों की जद्दो-जेहद, उनकी खर्चीली पर्यटन योजनाएं, मानसिक तौर पर थका देने वाली सपरिवार यात्राएं देखता हूं, तो उनसे झिंझोड़-झिझोड़ कर कहना चाहता हूं कि कभी अपने परिवार या प्रेमी के साथ पूरा दिन टाउन में गुजार कर देखो।

सुबह-सुबह किसी ईरानी कैफे में चाय-नाश्ता, फिर किसी गैलरी से मुफ्त आर्ट गैलरी मैप ले लें- दो-तीन किलोमीटर के अंदर आपको मंत्रमुग्ध करने वाली दर्जनों जगहें मिलेंगी। छत्रपति शिवाजी संग्रहालय के अंदर एक मनोहारी शॉप है- जहांगीर गैलरी में समोवर रेस्तरां, मॉर्डन आर्ट गैलरी के अहाते में आप टेबल पर बैठ कर किसी किताब का कोई हिस्सा अपनी प्रेमिका को सुना सकते हैं- थोड़ा जुगाड़ लगाएं, तो बाहर के रेहटी वाले आपको समोसे-भेल भी पकड़ा सकते हैं। रीगल के सामने एक चाय वाला इतनी अच्छी लेमन-ग्रास वाली चाय बनाता है कि आपकी थकान दूर हो जाएगी। फिर कितने ही महंगे और सस्ते रेस्तरां हैं- कोलाबा कॉजवे की शॉपिंग तो है ही, फैशन स्ट्रीट है- रास्ते में फुटपाथ पर फैली हुई पुरानी किताबों की दुकानें भी आपसे टकराएंगी।

सर जे.जे. स्कूल के अहाते में आप बेधड़क घुस जाएं- वहां दो-तीन कैंटींस हैं- कोई (शायद) आपको रोकेगा नहीं। कहीं भी पेड़ के नीचे सुस्ता लें, थोड़ी स्केचिंग कर लें- या कोई कविता लिख/पढ़ लें। यही काम आप एशियाटिक लायब्रेरी की सीढ़ियों पर भी कर सकते हैं।

शाम होने आई है- अब आप नरीमन पॉइंट की तरफ रुख करें। एक कोन आइसक्रीम खा लें और कोई खाली जगह देखकर बेशर्मी से लेट ही जाएं। ये प्रिस्क्रिप्शन सबके लिए है- आप अकेले हों, दुकेले या पूरे ‘गैंग’ के साथ- बाद में अलसाए पांवों से पैडल मारते हुए गोकुल बार (बड़े मियां के साथ वाला) या सनराइज (मेट्रो सिनेमा के साथ वाली गली में) में चले जाएं। बाद में अपनी साइकल लेट नाइट ट्रेन में डालें और लौट जाएं। थकान का यह कमाल का सुख आपको बड़े दिनों से नहीं मिला होगा- आपकी आंखें हौले-हौले उनींदी हो रही हैं- खाली ट्रेन में तसल्लीबख्श हवा के थपेड़े हैं- और आपकी मुस्कुराती हुई मित्र सोच रही है कि कितना अच्छा बंदा है, क्यों न इसे ‘फ्रेंड जोन’ से बाहर निकाला जाए…

Link to this article on NBT : http://epaper.navbharattimes.com/paper/10-16@16-28@12@2014-1001.html

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